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Husband Wife dispute: पति और पत्नी के बीच एक विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने दोनों पक्षों के बीच समझौता भी करा दिया था, लेकिन पत्नी आखिरी वक्त पर समझौते से मुकर गई और पति पर मुकदमा ठोक दिया.
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया है. जहां घरेलू विवाद में पहले तो पत्नी ने समझौता किया और फिर पति पर केस ठोक दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में क्या कदम उठाया, वरिष्ठ वकील प्रभजोत जौहर से समझिए. पत्नी के वैवाहिक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला बेहद महत्वपूर्ण है. दरअसल, पत्नी के आचरण से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर शादी भंग कर दी. पत्नी के शादी के 23 साल बाद दर्ज कराए गए घरेलू हिंसा के मामले को भी रद्द किया.

नाराज सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

पत्नी के समझौते के बाद पलटने पर भी कोर्ट ने सख्ती दिखाई और कहा ऐसे मामलों में तो भारी जुर्माना लगना चाहिए. भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि आपसी सहमति से तलाक के मामले में कोई भी पक्ष अंतिम आदेश से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन अगर दोनों पक्षों के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता हो चुका है, तो उस समझौते से पीछे हटना मंजूर नहीं किया जाएगा.यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय विश्नोई की बेंच ने उस मामले में की, जहां पत्नी ने कोर्ट द्वारा मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने की कोशिश की. 

120 करोड़ की ज्वेलरी और 50 करोड़ का सोना

पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया था कि समझौते के अलावा पति ने 120 करोड़ की ज्वेलरी और 50 करोड़ के सोने के बिस्किट वापस देने का वादा किया था, जिसमें टैक्स बचाने के लिए लिखित में नहीं रखा गया. इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह की दलील देना न्याय व्यवस्था के प्रति गंभीर असम्मान है. कोर्ट ने कहा कि 23 साल की शादी में पहली बार घरेलू हिंसा का मामला उठाया गया. यह केस बाद में और जानबूझकर दर्ज किया गया, ताकि विवाद जारी रखा जा सके.

पति-पत्नी के विवाद में समझौता

जस्टिस विजय विश्नोई द्वारा लिखे फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी कि कानून के तहत सहमति वापस लेना संभव है, लेकिन पूरा और अंतिम समझौता होने के बाद उसकी शर्तों से मुकरना सही नहीं है. एक बार मध्यस्थता में हुआ समझौता और कोर्ट द्वारा मंजूर होने के बाद वही आगे का आधार बन जाता है. ऐसे समझौतों से पीछे हटना मध्यस्थता सिस्टम को कमजोर करता है.

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भारी जुर्माना लगाने की बात कही

बिना उचित कारण समझौते से पीछे हटने पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए. कोर्ट ने साफ किया कि समझौते से केवल इन स्थितियों में ही पीछे हट सकते हैं अगर समझौता धोखाधड़ी, दबाव या गलत जानकारी से हुआ हो या दूसरे पक्ष ने अपनी शर्तें पूरी न की हों.

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कोर्ट ने माना कि शादी पूरी तरह टूट चुकी है.संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए तलाक दे दिया और घरेलू हिंसा का केस रद्द कर दिया और पति को बाकी तय रकम देने का आदेश दिया. पति-पत्नी की शादी साल 2000 में हुई थी. 2023 में पति ने तलाक की अर्जी दी. मामला फैमिली कोर्ट से मध्यस्थता में गया, जहां दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने और सभी विवाद खत्म करने पर सहमति दी थी.

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पति और पत्नी का झगड़ा, करोड़ों का कैश

समझौते के अनुसार पति ने पत्नी को डेढ़ करोड़ देने, 14 लाख कार के लिए देने और कुछ ज्वेलरी देने पर सहमति दी थी. पत्नी ने ज्वाइंट बिजनेस अकाउंट से 2.5 करोड़ पति को ट्रांसफर करने की बात मानी थी, लेकिन अंतिम चरण से पहले पत्नी ने तलाक की सहमति वापस ले ली और साथ ही घरेलू हिंसा (DV Act) का केस भी दर्ज कर दिया. जबकि पति ने 75 लाख और 14 लाख रुपये वापस दे दिए. 

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